घोटालों का उजागर होना क्या शुभ संकेत है..?

आज एक के बाद एक नये-नये घोटालों से अखबार का पहला पृष्ठ चमकता दिखाई देता है | दूसरी ओर समाचार चैनलों के लिए तो जैसे यह किसी किस्से से कम नहीं रह गया है | आये दिन नए-नए घोटालों के सामने आने से देश की प्रतिष्ठा पर तो आँच आई ही है, साथ ही साथ इनके लिए बनाई गयी जाँच कमेटीयों, पैसा लगाने वाले तथा वक़्त की अंधाधुंध बर्बादी ने देश के अर्थ व्यवस्था को खोखला कर दिया है | घोटालों के लिए बने जाँच आयोगों ने अब तक जितने भी घोटालों की जाँच करके रिपोर्ट प्रस्तुत की है, उनपर कितना अमल हो पाया है? या तो घोटालेबाजों पा आरोप ही तय नहीं हो पाया और अगर हुए भी तो किसी ना किसी अभाव में ज़्यादातर बाख ही गए हैं | उदहारण स्वरुप यूरिया घोटाला, बोफ़ोर्स घोटाला, प्रतिभूति घोटाला | क्या उनकी जाँच नहीं हुई थी? लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात | तो सवाल उठता है कि फिर किस आधार पर घोटालों के उजागर होने को देश के लिए शुभ संकेत माना जाए?

अगर बिहार में हुए चारा घोटाले को ही लें या फिर चलिए कुछ नया आज के युग के घोटाले को लेते हैं, जैसे कि २-जी या ३-जी स्कैम, इन सबके उजागर होने पर क्या हुआ? मात्र चंद कमेटीयाँ बनीं,कुछ लोगों को जेल भी हुई, कुछ को थोड़ी बहुत सज़ा भी मिली और कुछ अखबार की सुर्ख़ियों तक ही सिमट कर रह गयीं | पर क्या आम जनता पर कुछ फ़र्क पड़ा इनके उजागर होने से? क्या जनता का पैसा जो घोटाले में खो गया, वापस आया? क्या देश की हालत सुधरी? आज भी ऐसे कई लोग हैं जो घोटालों में फंसे हैं पर सत्ते में बैठकर नीतियाँ बना रहे हैं | अगर नीति निर्माता ही ऐसे लोग रहे हैं तो हाय ! मेरे देश के भविष्य, तेरा क्या होगा? कई सालों पहले बिहार में जब राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण में हो रही धांधलियों को उजागर करने का साहस इंजीनियर सतेन्द्र दूबे ने दिखाया था तो उसे बदले में मिली थी मौत | आज भी ऎसी घटनाएं कम नहीं हैं, आज भे जब आई.ए.एस अफसर या कोई भी अफसर अपना साहस दिखता है तो बदले में मिलता है उसे तबादले का फ़रमान, नतीजा शून्य | इससे यह सन्देश ज़रूर मिलता है, कि हो सकता है कि घोटालों के उजागर होने से जान गँवानी भी पड़ सकती है या तबादले की धाकली बर्दाश्त करनी पड़े | हर घोटाले के पीछे हमेशा से ही बड़े-बड़े नाम सामने आते हैं | इन नामों की असलीयत तो आम आदमी भी जानता ही है कि या तो ये कानून के गिरफ़्त में ही नहीं आयेंगे या फिर नए घोटाले कर बा-इज्ज़त बारी हो जायेंगे या फिर जेल में होते हुए भी शान से रहेंगे क्योंकि आखिर पैसा तो है ही !

दिन-प्रतिदिन उजागर होते इन  घोटालों से देश की जनता ही नहीं बल्कि कल का भविष्य कहे जाने वाले आज का युवा वर्ग आश्चर्यचकित होने के साथ साथ भयभीत भी है | बेरोज़गारी की मार झेल रहा आज का युवा वर्ग क्या सीख लेगा in घोटालों तथा घोटालेबाज़ों से? आखिर आज वो किसे अपना प्रेरणास्त्रोत बनाए? आज जिन घोटालों की कथाओं ने युवा वर्ग के वर्तमान को ही रौंद दिया हो, वहाँ उनके भविष्य के स्वर्णिम होने की कल्पना करना क्या मात्र ढकोसला नहीं है?

अपनी राए अवश्य दें…!

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